(यह कहानी देवन बालकृष्णन ने लिखी और भेजी है। वे अब दुबई में रहते हैं, लेकिन उनका बचपन भारत के केरल में बीता। इस कहानी के ज़रिए वे हमें केरल में अपनी दादी से जुड़ी बचपन की यादों में ले जाते हैं।)
कुछ यादें कभी फीकी नहीं पड़तीं। वे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं और चाहे कितने भी साल बीत जाएँ, चुपचाप हमारे दिल में बसी रहती हैं। मेरी दादी भी ऐसी ही एक याद हैं।
1980 के शुरुआती वर्षों में, जब उनके गाँव के कटहल के पेड़ पर सबसे बड़े और मीठे कटहल लगते थे, तो वे कभी उन्हें अपने लिए रखने के बारे में नहीं सोचती थीं। उनका पहला ख्याल हमेशा त्रिवेंद्रम में रहने वाले अपने पोते-पोतियों का होता था।
वे जो कटहल लेकर आती थीं, वह कोई छोटा-मोटा फल नहीं होता था। उसका वजन लगभग 15 से 18 किलो होता था। फिर भी, सुबह-सुबह वे उसे अपने सिर पर रखतीं और एक बहुत कठिन सफर शुरू करतीं। यह सफर वे किसी मजबूरी में नहीं करती थीं। वे सिर्फ हमें खुश करने के लिए इतना सब करती थीं।
वे दिन आज से बहुत अलग थे। उस समय मोबाइल फोन नहीं थे और किसी को फोन करके यह बताने का कोई आसान तरीका नहीं था कि आप आने वाले हैं। हमें कभी पता नहीं होता था कि दादी कब आएँगी। न कोई संदेश आता था, न फोन, और न कोई खबर कि दादी रास्ते में हैं। इसलिए जब भी हम उन्हें हमारे घर के पास वाले चौराहे पर देखते, तो वह हमारे लिए बहुत बड़ा आश्चर्य और खुशी का पल होता था।
उनके गाँव में अच्छी सड़कें नहीं थीं। मुरुक्कुमपुझा रेलवे स्टेशन तक पहुँचने के लिए उन्हें लगभग चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। रास्ता संकरा था और धान के खेतों के बीच से होकर जाता था। रास्ते ऊबड़-खाबड़ और कठिन थे। सफर में उन्हें आवारा कुत्ते मिलते, साँपों से सावधान रहना पड़ता और कभी-कभी रास्ते में आने वाली छोटी नदी या पानी की धाराओं को भी पार करना पड़ता था।
इतना भारी कटहल सिर पर रखकर भी वे धैर्य से इन सभी मुश्किलों को पार करती थीं। लगभग एक घंटे पैदल चलने के बाद वे मुरुक्कुमपुझा रेलवे स्टेशन पहुँचती थीं।
ट्रेन आने पर वे सावधानी से कटहल को अंदर रखतीं और त्रिवेंद्रम के लिए सफर शुरू करतीं। करीब एक घंटे बाद वे शहर के रेलवे स्टेशन पहुँचती थीं। लेकिन उनका सफर अभी भी खत्म नहीं होता था।
वे फिर से कटहल उठाकर शहर के बस स्टेशन तक पैदल जातीं, जहाँ से हमारे घर की ओर आने वाली बस मिलती थी। लगभग दोपहर 3 बजे वे हमारे घर के पास वाले चौराहे पर पहुँच जातीं। वहाँ एक छोटी-सी दुकान के पास छाँव में बैठकर आराम करतीं और स्कूल से हमारे लौटने का इंतज़ार करतीं।
लगभग 3:30 बजे मैं और मेरा भाई स्कूल से निकलकर पैदल घर आते थे। तभी अचानक हमें दादी दिखाई देतीं। वे छोटी-सी दुकान के पास खड़ी होतीं, चेहरे पर बड़ी-सी मुस्कान और हमारे लिए बड़ा-सा सरप्राइज़ लिए।
उन्हें वहाँ देखकर हम हमेशा हैरान और बहुत खुश हो जाते थे, क्योंकि हमें कभी पता नहीं होता था कि वे आने वाली हैं। दादी को अचानक सामने देखने की वह खुशी मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ।
हम दौड़कर उनके पास जाते, उनके हाथ छूते, उन्हें गले लगाते और चूमते। उनके कपड़ों से Cuticura टैल्कम पाउडर की जानी-पहचानी खुशबू आती थी, जो हमें बहुत पसंद थी। लेकिन उसके साथ एक और गंध भी होती थी—तेज़ धूप में लंबे सफर की स्वाभाविक गंध। सुबह से पैदल चलने और इतना भारी कटहल खेतों और रास्तों से लेकर आने के कारण उनके कपड़ों में पसीने और थकान की गंध भी होती थी।
लेकिन हमारे लिए वह गंध कभी बुरी नहीं थी। वह प्यार, त्याग और उस दादी की मेहनत की खुशबू थी, जो सिर्फ हमारे साथ कुछ पल बिताने के लिए कई किलोमीटर का कठिन सफर तय करके आई थीं।
फिर हम सब मिलकर उस कीमती कटहल को लेकर दुकान से घर तक जाते थे। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि वह कटहल उनका सबसे बड़ा उपहार नहीं था।
सबसे बड़ा उपहार वे खुद थीं—उन्होंने हमें अपना समय दिया, हमारे लिए इतनी मेहनत की और अपने गाँव से हमारे लिए ढेर सारा प्यार लेकर आईं।
मुझे आज भी सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की होती है कि वे हमारे पास ज्यादा देर रुकती भी नहीं थीं। उसी दिन वे वापस घर जाना चाहती थीं, क्योंकि उनकी मुर्गियाँ, भेड़ें, गाय और उनके दूसरे बच्चे उनका इंतज़ार कर रहे होते थे। मुस्कुराते हुए वे फिर से वापसी का सफर शुरू कर देती थीं।
बचपन में हमें कभी समझ नहीं आया कि उनका यह सफर कितना मुश्किल था। हमें बस इतना पता होता था कि दादी आई हैं, और इसका मतलब था खुशी।
चालीस से भी ज्यादा साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी मुझे उनके कपड़ों की वह खुशबू और उनके पास होने का सुकून याद है। Cuticura टैल्कम पाउडर की खुशबू आज भी मुझे उन दोपहरों में वापस ले जाती है, जब हमें पता भी नहीं होता था कि दादी आने वाली हैं।
मेरी दादी का 2019 में निधन हो गया, लेकिन मेरे दिल से वे कभी नहीं गईं। मैं आज भी उन्हें हर दिन याद करता हूँ। कुछ रातों में मैं उनकी मुस्कान, उनके हाथ, उनकी दयालुता और हमारे लिए किए गए उन लंबे सफरों के बारे में सोचता रहता हूँ।
बचपन में मुझे लगता था कि दादी अपने सिर पर एक भारी कटहल लेकर आ रही हैं।
अब मुझे सच समझ में आता है।
वे प्यार लेकर आ रही थीं।
और कोई दूरी, कीचड़ भरा रास्ता, आवारा कुत्ता, साँप, नदी, ट्रेन या बस उन्हें हम तक वह प्यार पहुँचाने से कभी नहीं रोक सकती थी।
कहानी को अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ें।
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